गुरुवार, 26 मार्च 2009

प्यार वो मिटास में लिपटी मिटी छुरी है जो सिर्फ घाव देती है सारी जिंदगी इन्सान उसी दर्द के नशे में डूबा रहता है तिल-तिल मिटाता रहता है और उसे पता भी नहीं चलता

1 टिप्पणी:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

प्राय: ऐसे प्यार को
हम प्यार समझने की भूल
कर बैठते हैं,
पर वास्तव में
वह प्यार होता ही नहीं है!
प्यार तो केवल वही
और
केवल वही होता है,
जो सुख के सागर में
गोते लगवाता है!